ऐ जज़्बा-ए-दिल ग़र मैं चाहूँ (Ghazal by Behzad Lakhanavi)

ऐ जज़्बा-ए-दिल ग़र मैं चाहूँ (Ghazal by Behzad Lakhanavi)

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बहज़ाद लखनवी (1895 – 1974) की एक मशहूर ग़ज़ल, जिसे कई ग़ज़ल-गायकों ने गाया है – 

ऐ जज़्बा-ए-दिल ग़र मैं चाहूँ हर चीज़ मुकाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए

ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तैयार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल  आ जाए

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे देना
इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए

अब क्यूँ ढूँढूं वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए

इस जज्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुमसे लेता हूँ
उस वक़्त मुझे क्या लाजिम है जब तुझ पे मेरा दिल आ जाए

ऐ बर्क-ए-तज़ल्ली क्या तू ने मुझ को भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुकाबिल आ जाए

आता है जो तूफां आने दो कश्ती का खुदा खुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए

– A Ghazal by Behzad Lakhanavi

 

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