आजादी की लड़ाई का वह योद्धा, अंग्रेज जिसके सामने भी पड़ने से...

आजादी की लड़ाई का वह योद्धा, अंग्रेज जिसके सामने भी पड़ने से कतराते थे

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भारत की आजादी की लड़ाई में न जाने कितने लोगों ने असहनीय कष्ट झेले, अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं लेकिन कुछ को तो इतिहासकारों ने याद रखा जबकि कई गुमनामी के अंधियारों में खो गए. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यतीन्द्र नाथ मुखर्जी एक ऐसा ही नाम है जिनके बारे में आज की युवा पीढ़ी उतना नहीं जानती जितने के वो हकदार थे.
आपने फिल्मों में एक अकेले हीरो को दस दस गुंडों को पटक पटक कर मारते पीटते देखा होगा लेकिन यदि हम आपसे कहें कि इस देश में सचमुच यतीन्द्र नाथ मुखर्जी नामक एक आदमी ऐसा हुआ है जो आज से एक सदी पहले हकीकत में यह सब करके दिखा देता था तो शायद आप यकीन नहीं करेंगे. लेकिन ये सच है कि यतीन्द्र ने एक बार नहीं, कई बार अंग्रेजों की पिटाई की थी और वे अंग्रेजों के लिए खौफ का दूसरा नाम बन गए थे.

एक ऐसा दौर जब अंग्रेजों को आता देख लोग घरों में दुबक जाया करते थे, तब यतीन्द्र को देखकर अंग्रेज दुबकने की कोशिश में लग जाते थे. एक बार रेलवे स्टेशन पर आठ अंग्रेजों को उन्होंने अकेले ही पीट दिया था. 7 दिसम्बर 1879 को कायाग्राम जिला कुष्टिया (जो अब बांग्लादेश में है) में जन्मे यतीन्द्र बचपन से ही बलिष्ठ शरीर के स्वामी थे.
पांच वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता का देहांत हो गया. माँ ने बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए उनका लालनपालन किया. उन्हें शुरू से ही शारीरिक गतिविधियों में रूचि थी और तैराकी, घुड़सवारी आदि खेल उन्हें बहुत प्रिय थे.
शारीरिक सौष्ठव के स्वामी तो दुनिया में बहुत लोग होते हैं लेकिन कम ही होते हैं जो उसका उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करते हैं. यतीन्द्र के भीतर परोपकार और देशप्रेम की भावना कूटकूट कर भरी हुई थी. एक बार उनके शहर में एक घोडा बिगड़ गया जिसने कई लोगों को घायल कर दिया. लोग उससे जान बचाने के लिए भाग रहे थे. यतीन्द्र ने उस बिगडैल घोड़े को काबू कर लोगों की जान बचाई. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 11 साल थी.

उनका एक किस्सा बहुत मशहूर है जिसकी वजह से उन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से जाना जाता है. एक बार उनके गाँव में तेंदुए का आतंक फैला हुआ था. उन्हें पता चला तो एक खुखरी लेकर उसे मारने निकल पड़े. जंगल में पहुंचे तो तेंदुआ तो नहीं मिला पर रॉयल बंगाल टाइगर से मुलाक़ात हो गई. हाथ में छोटी सी खुखरी और सामने खूंखार बाघ ! पर जतिन तो जतिन थे. भिड गए बाघ से और उसे मारकर ही दम लिया. इस घटना ने उन्हें पूरे बंगाल का हीरो बना दिया. अखबारों में उनकी जमकर तारीफ़ हुई और उन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से जाना जाने लगा.
उनका ह्रदय खरे सोने का था. एक वृद्ध मुस्लिम महिला का घास का गट्ठर रोज अपने सिर पर रखकर उसके घर पहुंचाने जाते थे. उस बूढ़ी माँ से उनका इतना स्नेह जुड़ गया था कि वे कई बार उसके साथ खाना खाते और पैसे देकर उसकी मदद भी करते थे.
देशवासियों का अपमान उनसे सहन नहीं होता था. एक बार अंग्रेजों के द्वारा एक भारतीय का अपमान होते देखा तो चार अंग्रेजों की वहीं जमकर ठुकाई कर डाली. इसके बाद अंग्रेज उन्हें देखते ही दायें बाएं होने में भलाई समझने लगे.
कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आये जिसके बाद उनके मन में देश के लिए कुछ करने की इच्छा बलवती हो उठी. यतीन्द्र देश के संभवतः पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महसूस किया कि भारत की अपनी एक नेशनल आर्मी होनी चाहिए. हालांकि यह विचार बाद में सुभाषचंद्र बोस द्वारा ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ बनाकर अस्तित्व में लाया गया.
1900 में उस समय के क्रांतिकारियों के सबसे बड़े संगठन की स्थापना हुई जिसका नाम था, अनुशीलन समिति. जतिन ने इसकी स्थापना में अहम् भूमिका निभाई. बंगाल के हर जिले में इसकी शाखा खोली गई और बाद में बिहार और उड़ीसा में इसका प्रसार किया गया.
1905 में कलकत्ता में प्रिंस ऑफ़ वेल्स अर्थात ब्रिटेन के राजकुमार का दौरा हुआ. उनका स्वागत जुलूस निकल रहा था. एक गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज बैठे हुए थे जिनके जूते खिडकियों पर लटक रहे थे, गाडी में बैठी महिलाओं के बिलकुल मुंह पर.  जतिन ने यह देखा तो तो उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने अंग्रेजों से नीचे उतरने को कहा. अंग्रेज नहीं माने तो जतिन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया. वे गाडी की छत पर चढ़ गए और एक एक करके सभी अंग्रेजों की जम कर ठुकाई की और नीचे फेंक दिया.
यह घटना ब्रिटेन के राजकुमार की आँखों के सामने घटी थी लिहाजा अंग्रेज अफसर अपने लोगों की गलती पर पर्दा नहीं डाल पाए और बाघा जतिन के बजाय उन्हें अपने लोगों को ही दोषी करार देना पड़ा. लेकिन इस घटना के कुछ सकारात्मक परिणाम हुए जैसे कि भारतीयों के मन से अंग्रेजों का डर कुछ हद तक कम हुआ. दुनिया को अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ किये जा रहे दुर्व्यवहार के बारे में पता चला और बंगाल के क्रांतिकारियों के मन में जतिन के प्रति सम्मान बहुत बढ़ गया.
अंग्रेज कई बार उनके गुस्से का शिकार हुए. एक दिन सिलीगुड़ी स्टेशन पर अंग्रेजों के एक मिलिट्री ग्रुप से उनकी भिड़ंत हो गई. कैप्टन मर्फी की अगुवाई में अंग्रेजों ने जतिन से बदतमीजी की, तो जतिन ने अकेले उन आठों को जमकर मारा.
अखबारों में मजाक बना कि एक अकेले भारतीय ने आठ आठ अंग्रेज अफसरों को जम कर मारा. अंग्रेजों की बेइज्जती होती देख मजिस्ट्रेट ने अफसरों को सलाह दी कि केस वापस ले लो. जतिन ने भी खेद जता दिया, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि फिर से अगर मेरे देशवासियों के साथ ऐसी हरकत होगी तो फिर मारूंगा. हैरान परेशान मजिस्ट्रेट ने जतिन से पूछा कि तुम एक साथ कितने लोगों को पीट सकते हो ? जतिन ने जवाब दिया कि ईमानदार हों तो एक भी नहीं और बेईमान हों तो गिनती नहीं.
1910 में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करते वक्त यतींद्र नाथ ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें साल भर के लिए जेल भेज दिया गया. जेल से मुक्त होने पर वह ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य बन गए और ‘युगान्तर’ का कार्य संभालने लगे. उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-‘ पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है. देशी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी मांग है.’
जतिन काफी गोपनीयता और चतुराई से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियाँ चलाते थे. अंग्रेज उन्हें लाख पकड़ने की कोशिश करते लेकिन हर बार सबूतों के अभाव में वे बच निकलते थे. अपनी इसी बुद्धिमत्ता के कारण वे क्रांतिकारियों के बीच काफी सम्मानित स्थान रखते थे. यहाँ तक कि उनकी पहुँच रंगून और सिंगापुर तक हो गई थी.
उस जमाने में क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था. इन डकैतियों में ‘गार्डन रीच’ की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है. इसके नेता यतींद्र नाथ मुखर्जी थे. विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था. कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी. इस कम्पनी की एक गाडी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को ५२ मौजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं.
लेकिन जतिन महज एक क्रान्तिकारी ही नहीं थे, वे एक बड़े समाजसेवी भी थे. वे कई संस्थाएं भी चलाते थे जो चिकित्सा, शिक्षा और कृषि के क्षेत्रों में काम करती थीं. उन्होंने कई विद्यार्थियों को विदेश में पढ़ने जाने हेतु मदद की.
जतिन जब जेल में थे तब उन्होंने साथी कैदियों के साथ मिलकर देश को आजाद करवाने का एक बेहद अहम प्लान बनाया. ये जतिन की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा प्लान था जिसे ‘जर्मन प्लाट’ के नाम से जाना जाता है. इतिहासकार मानते हैं कि यदि जतिन का यह प्लान कामयाब हो जाता तो देश को 1915 में ही आजादी मिल जाती.
जतिन के प्लान के मुताबिक़ जर्मनी से हथियारों की एक बड़ी खेप मंगाकर अंग्रेजों पर निर्णायक हमला करने की तैयारी थी लेकिन एक चेक जासूस इमेनुअल विक्टर वोस्का के कारण प्लान चौपट  हो गया. क्रान्तिकारियों के हाथ लगने के बजाय हथियार से लदा जहाज अंग्रेजों के हाथ लग गया.
चेक के ही रॉस हेडविक ने बाद में लिखा था कि “इस प्लान में अगर इमेनुअल विक्टर वोस्का ना घुसता तो किसी ने भारत में गांधी का नाम तक ना सुना होता और राष्ट्रपिता बाघा जतिन को कहा जाता”.
9 सितम्बर 1915 का दिन था. जतिन और उनके साथी अंडरग्राउंड थे लेकिन पुलिस ने उनके छुपने की जगह ढूँढ ही निकाली. इससे पहले कि जतिन और अन्य क्रांतिकारी साथी वहाँ से निकल पाते पुलिस ने उन्हें घेर लिया. दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं. क्रांतिकारियों ने एक पुलिस अफसर को ढेर कर दिया. यह देखकर आसपास से और भी फ़ोर्स बुला ली गई.
साथियों ने जतिन से निकल जाने को कहा लेकिन यतीश नामक एक साथी बीमार था और जतिन उसे छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए.  चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था. दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली. चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया. वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे. इस दौरान जतिन का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था. उन्हें तेज प्यास लग रही थी. मनोरंजन उन्हें उठाकर नदी की तरफ ले जाने लगा. यह देख अंग्रेज अफसर ने गोलीबारी बंद करवाई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया.
गिरफ्तारी देते वक्त जतिन ने अफसर से कहा- ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे. बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं.
इसके अगले दिन भारत की आज़ादी के इस महान सिपाही ने बालासोर के अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं.
अंग्रेजों के दिलोदिमाग पर बाघा जतिन की निडरता और दुस्साहसी स्वभाव का कैसा प्रभाव था इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि उनकी मौत के बाद चले ट्रायल के दौरान ब्रिटिश प्रॉसिक्यूशन अफसर ने कहा था, “Were this man living, he might lead the world.”
आज आजाद भारत में कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को क्रांतिकारियों की कहानियां सुनाते हैं. उस समय के कोलकाता पुलिस के डिटेक्टिव डिपार्टमेंट के हैड और बंगाल के पुलिस कमिश्नर रहे चार्ल्स टेगार्ट ने कहा था, “अगर बाघा जतिन अंग्रेज होते तो अंग्रेज लोग उनका स्टेच्यू लंदन में ट्रेफलगर स्क्वायर पर नेलशन के बगल में लगवाते”.
जतिन कहा करते थे  – ‘अमरा मोरबो, जगत जागबे’ यानी ‘हमारे मरने से देश जगेगा’. उनका व्यक्तित्व और इस देश की आजादी की लड़ाई में योगदान इतना विराट था कि उसे एक लेख में समेटना संभव नहीं है, पर इस बहाने उन्हें याद जरूर किया जा सकता है.

(सूचना स्रोत – News18, Wikipedia)

 

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