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अरबपति ने मात्र 500 रुपये देकर बेटे को आम आदमी की तरह कमाने भेजा, बेटा एक महीने में 5000 कमाकर लौटा

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जिसके पिता का कारोबार 6000 करोड़ से भी अधिक का हो, वह बेटा अनजान शहर में अपनी पहचान छुपाकर नौकरी करे, मजदूरों के साथ सोये और खाना खाए, ऐसा हम सोच भी नहीं सकते हैं. लेकिन गुजरात के सूरत के ढोलकिया परिवार की ये परंपरा है कि वहाँ हर बेटे को इस अग्निपरीक्षा से गुजरना ही पड़ता है.

सूरत में ‘हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट्स’ अरबों की कंपनी है जिसके मालिक घनश्याम भाई ढोलकिया हैं. हाल ही में उनके 23 साल के बेटे हितार्थ ढोलकिया ने हैदराबाद में एक महीने तक किसी आम गरीब आदमी की  तरह दिन बिताये.

पिता ने हितार्थ को मात्र 500 रुपये दिए और हैदराबाद तक का फ्लाइट का टिकट दिया. न ही मोबाइल दिया गया और न ही एटीएम कार्ड. हितार्थ से कहा गया कि इन्ही 500 रुपयों में उन्हें हैदराबाद में जाकर एक महीना गुजारकर आना है. बिना किसी ऐशोआराम के.

साथ में पिता की शर्त थी कि कहीं भी वे अपनी पहचान उजागर नहीं करेंगे. और न ही एक जगह एक हफ्ते से ज्यादा नौकरी करेंगे. पिता के लिए सबसे ख़ुशी की बात ये हैं कि हितार्थ ने उनकी सभी हिदायतों का पालन करते हुए हैदराबाद में न सिर्फ 1 महीना बिताया बल्कि 5000 रुपये भी कमाकर लौटे. 

अमेरिका में पढ़े हितार्थ जब हैदराबाद पहुंचे तो समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. मोबाइल नहीं था तो किसी से मोबाइल मांगकर पिताजी के सहायक को फ़ोन लगाया पर उन्होंने फ़ोन ही नहीं उठाया. शायद पिताजी ने सहायक को भी हिदायत दे रखी होगी.
पहला दिन नौकरी की तलाश में निकल गया. शाम को ठहरने की चिंता होने लगी. कोई भी आईडी कार्ड नहीं था इसलिए कोई भी रखने को तैयार नहीं हुआ. जैसे तैसे एक लॉज के मालिक ने उधार में रहने की अनुमति दी क्योंकि जेब में पैसे भी सीमित ही थे. एक ठेले से 20 रुपये की राइस प्लेट खाकर नौकरी की तलाश में निकल पड़े.
दो दिन की तलाश के बाद मैकडोनाल्ड्स में काम मिला. लेकिन एक सप्ताह बाद नौकरी बदलने की शर्त थी. मैकडोनाल्डस का मेनेजर सैलरी देने को तैयार न था. जैसे तैसे सैलरी के रूप  में 1500 रुपये मिले. दूसरी नौकरी ढूंढी जिसमें बाइक से आर्डर डिलीवरी करने थे. तीसरी नौकरी adidas के शोरूम में की. लेकिन इस दौरान उन्हें ज़िन्दगी के कुछ ऐसे अनुभव हुए जो उन्हें अपनी लक्ज़री लाइफ में कभी मिल नहीं सकते थे.
बहरहाल, हितार्थ अब घर लौट आये हैं और साथ में 5000 रुपये की सेविंग भी कर के लाये हैं. पिता घनश्याम ढोलकिया का कहना है कि उनके परिवार की परंपरा है कि वे बच्चों को अज्ञातवास पर भेजते हैं जिससे वे आम जीवन की तकलीफें और मानवीय मूल्यों को समझ सकें. पिछले साल भी उन्होंने अपने दूसरे बेटे दृव्य को भेजा था जो 4000 रुपये कमाकर लाया था.

(Source)

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