चंद रोज़ और – A Nazm by Faiz Ahmed Faiz

चंद रोज़ और मेरी जान फक़त चंद ही रोज़ ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर हैं हम इक ज़रा और सितम सह लें, तड़प लें, रो लें अपने अजदाद की मीरास है माजूर हैं हम
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