Shayari in Hindi

Hindi Urdu Sher Shayari | Shayari in Hindi Language

रंजिश ही सही (Ghazal by Ahmed Faraz in Hindi)

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-खुशफहम को हैं तुझ से उम्मीदें
ये आखरी शम्में भी बुझाने के लिए आ

Dushyant Kumar Poetry (Shayari) in Hindi

Dushyant Kumar, a poet of modern Indian literature, was born on September 27, 1931 in Bijnor district of Uttar Pradesh. He wrote many dramas, poems, Gazals, short stories and inspired a whole generation of emerging poets. He died at an early age of 42 in 1975.

Here, we’ve collected some of his best Ghazals (Shayaris), which you can read in Hindi font –

1. Chaandni chhat pe chal rahi hogi … (By Dushyant Kumar)

चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ सी पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शमा सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फसल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझको दुलराया
उनमें मेरी ग़ज़ल रही होगी (more…)

Wo jo ham men tum men qaraar tha – [Momin Shairy in Hindi]

वो जो हम में तुम में करार था, तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो नए गिले वो शिकायतें, वो मज़े-मज़े की हिकायतें
वो हरेक बात पे रूठना, तुम्हें याद हो कि न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना, तुम्हें याद हो कि न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आपका
वो निबाहने का ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो कि न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो कि न याद हो

कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू, तो इशारतों से ही गुफ्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला, तुम्हें याद हो कि न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला, तुम्हें याद हो कि न याद हो

Aarzoo hai vafaa kare koi [Ghazal By Daag Dehlvi]

आरज़ू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई

गर मर्ज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई

कोसते हैं जले हुए क्या-क्या
अपने हक में दुआ करे कोई

उन से सब अपनी-अपनी कहते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई

तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई

जिसमें लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत का क्या करे कोई

Log toot jaate hain [Bashir Badr Shayari in Hindi]

A very famous Ghazal of Bashir Badr – 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

और जाम टूटेंगे इस शराब खाने में
मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में

फाख्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन सांप रखता है उसके आशियाने में

दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आएगी
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में

Aansuon se dhuli khushki ki tarah [Gazal By Bashri Badr]

आंसुओं से धुली खुश्की की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह

हम खुदा बन के आयेंगे वरना
हम से मिल जाओ आदमी की तरह

बर्फ सीने की जैसे जैसे गली
आँख खुलती गई कली की तरह

जब कभी बादलों में घिरता है
चाँद लगता है आदमी की तरह

किसी रोजां किसी दरीचे से
सामने आओ रोशनी की तरह

सब नज़र का फरेब है वरना
कोई होता नहीं किसी की तरह

खूबसूरत उदास खौफज़दा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह

जानता हूँ कि एक दिन मुझको
वो बदल देगा डायरी की तरह

Khushboo ki tarah aaya – [By Bashir Badr]

खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में

तुम छत पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकला
ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में

इस शहर में इक लड़की बिलकुल है ग़ज़ल जैसी
फूलों का बदन वाली खुशबू सी अदाओं में

दुनिया की तरह वो भी हँसते हैं मोहब्बत पर
डूबे हुए रहते थे जो लोग वफाओं में

मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को
मासूम मोहब्बत है फूलों की खताओं में

भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मजलूम परिंदों की मासूम सभाओं में

दादा बडे भोले थे सबसे यही कहते थे
कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेजी दवाओं में

Apne khwaabon mein tujhe [Shayari By Abbas ‘Dana’]

A famous Ghazal (Urdu Poetry) of Abbas ‘Dana’, in Hindi – 

अपने ख़्वाबों में तुझे जिसने भी देखा होगा
आँख खुलते ही तुझे ढूँढने निकला होगा

ज़िन्दगी सिर्फ तेरे नाम से मंसूब रहे
जाने कितने ही दिमागों ने ये सोचा होगा

दोस्त हम उसको ही पैगाम-ए-करम समझेंगे
तेरी फुरकत का जो जलता हुआ लम्हा होगा

दामन-ए-जीस्त में अब कुछ भी नहीं है बाकी
मौत आई तो यकीनन उसे धोका होगा

रौशनी जिस से उतर आई लहू में मेरे
ऐ मसीहा वो मेरा ज़ख्म-ए-तमन्ना होगा