3 Finest Ghazals of Anand Narain Mulla

3 Finest Ghazals of Anand Narain Mulla [in Hindi]

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Awarded by Sahitya Akademi Award in 1964 for his Urdu poetry, Anand Narain Mulla was a prominent Urdu poet of India. He was born in 1901 and died in 1997. He was also elected a member of 4th Loksabha and later elected a member of Rajyasabha in 1972.

Here we are presenting 3 best Urdu poems (Shayari) from his collection (in Hindi) –

1. Jaan-e-afsaanaa yahii …

जान-ए-अफ़साना यही कुछ भी हो अफ़साने का नाम
ज़िन्दगी है दिल की धड़कन तेज़ हो जाने का नाम

कतरा-कतरा ज़िन्दगी के ज़हर का पीना है गम
और ख़ुशी है दो घड़ी पी कर बहक जाने का नाम

इंतज़ार-ए-फस्ल-ए-गुल में खो चुके आँखों का नूर
और बहार-ए-बाग़ लेती ही नहीं आने का नाम

ताब-ए-नाकामी नहीं तो आरजू करता है क्या
आरजू है मौज के साहिल से टकराने का नाम

आज तू कल कोई और होगा सदर-ए-बज़्म-ए-मय
साकिया तुझसे नहीं हमसे है मैखाने का नाम

वाकिफ-ए-‘मुल्ला’ न थी बज़्म-ए-खिरद, ये तय हुआ
हो न हो, ये हैं किसी मशहूर दीवाने का नाम 

2. Fitanaa fir aaj uthaane …

फितना फिर आज उठाने को है सर लगता है
खून ही खून मुझे रंग-ए-सहर लगता है

मान लूँ कैसे कि मैं ऐब सरापा हूँ फ़क़त
मेरे अहबाब का ये हुस्न-ए-नज़र लगता है

कल जिसे फूंका था ये कह के कि दुश्मन का है घर
सोचता हूँ तो वो आज अपना ही घर लगता है

एहतियातन कोई दर फोड़ लें दीवार में अब
शोर बढ़ता हुआ कुछ जानिब-ए-दर लगता है

एक दरवाज़ा है हर सम्त में खुलने के लिए
हो न हो ये तो मुझे शेख का घर लगता है

3. Sar-e-mahashar yahii poochhuunga …

सर-ए-महशर यही पूछूँगा खुदा से पहले
तूने रोका भी था मुजरिम को खता से पहले

अश्क आँखों में हैं होंठों पे बुका से पहले
काफिला गम का चला बांग-ए-दरा से पहले

उड़ गया जैसे यकायक मेरे शानों पर से
वो जो इक बोझ था तस्लीम-ए-खता से पहले

हाँ यहाँ दिल जो किसी का है अब आईना-ए-हुस्न
वर्क-ए-सादा था उल्फत की जिया से पहले

इब्तिदा ही से न दे जीस्त मुझे दर्स उसका
और भी बाब तो हैं बाब-ए-रज़ा से पहले

मैं गिरा ख़ाक पे लेकिन कभी तुम ने सोचा
मुझ पे क्या बीत गई लगजिश-ए-पा  से पहले

अश्क आते तो थे लेकिन ये चमक और तड़प
उन में कब थी गम-ए-उल्फत की जिया से पहले

दर-ए-मैखाना से आती है सदा-ए-साक़ी
आज सेराब किये जायेंगे प्यासे पहले

राज़-ए-मयनोशी-ए-मुल्ला हुआ अफशां वर्ना
समझा जाता था वाली लगजिश-ए-पा से पहले

 

 

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