ये आरज़ू थी – Ghazal by Haider Ali ‘Aatish’

ये आरज़ू थी – Ghazal by Haider Ali ‘Aatish’

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ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ्तगू करते
(रू-ब-रू = in front of, गुफ्तगू = conversation)

पयाम बर न मयस्सर हुआ तो खूब हुआ
ज़बान-ए-गैर से क्या शर की आरज़ू करते
(मयस्सर = available, शर = mischief)

मेरी तरह से माह-ओ-महर  भी हैं आवारा
किसी हबीब को ये भी हैं जुस्तजू करते
(माह-ओ-महर= Moon and Sun, हबीब = friend)

जो देखते तेरी जंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
असीर होने की आज़ाद आरज़ू करते
(असीर = prisoner)

न पूछ आलम-ए-बरगश्ता तालि-ए -आतिश
बरसती आग में जो बारां की आरज़ू करते
(बरगश्ता = turn around / against, तालि-ए-आतिश = burning fate, बारां = rain)

– हैदर अली “आतिश”

 

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