Dekh lo dil ki jaan se – (Meer Taqi Meer Poetry)

Dekh lo dil ki jaan se – (Meer Taqi Meer Poetry)

1
SHARE

देख लो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआं सा कहाँ से उठता है

गोर  किस दिलजले की है ये फ़लक
शोला इक सुबह याँ से उठता है
खाना-ए-दिल से ज़िं हार न जा
कोई ऐसे मकाँ से उठता  है
नाला सर खेंचता है जब मेरा
शोर इक आसमां से उठता है
बैठने कौन दे है फिर उसको
जो तेरे आस्तां से उठता है
यूं उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है
इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
बोझ कब नातवाँ से उठता है
(नातवाँ = weak)

 

1 COMMENT

  1. Zulmat-e-shab ko sitaaron se
    sanwaara hum ne,
    Kitni raton ko tujhe uth uth ke pukara
    hum ne,
    Jab kabhi hath se umeed ka daaman
    choota,
    Le liya aap ke daaman ka sahara hum
    ne,
    Yoon to dunya bhi mukhaalif hai
    hamari warna,
    Rukh badaltey huye dekha hai
    tumhara hum ne…..

LEAVE A REPLY