बेखुदी ले गई कहां – A Ghazal in Hindi By ‘Meer’

बेखुदी ले गई कहां – A Ghazal in Hindi By ‘Meer’

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बेखुदी ले गई कहां हमको
देर से इंतज़ार है अपना

रोते फिरते हैं सारी-सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना

दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इसमें क्या इख्तियार है अपना

कुछ नहीं हम मिसाल-ए-अंका लेक
शहर-शहर इश्तहार है अपना
(मिसाल-ए-अंका = rare / unobtainable)

जिसको तुम आसमान कहते हो
सो दिलों का गुबार है अपना

– मीर

 

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