आह को चाहिए – Mirza Ghalib Ghazal in Hindi

आह को चाहिए – Mirza Ghalib Ghazal in Hindi

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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक 

आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक
(सब्र-तलब= patient)

हम ने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को खबर होने तक
(तगाफुल = neglect / ignore)

पर्तव-ए-खूर से है शबनम को फना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक
(पर्तव-ए-खूर = Sun’s rays, शबनम = dew, फना = perish, इनायत= favour)

यक नज़र बेश नहीं फुर्सत-ए-हस्ती गाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक्स-ए-शरर होने तक
(बेश=excess, गाफ़िल= ignorant, रक्स= dance, शरर= flash / fire)

गम-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक
(जुज़= other than, मर्ग = death)

– Mirza Ghalib

 

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