वो शायर जो सिर्फ 42 वर्ष जिया लेकिन उसने जो लिखा वह...

वो शायर जो सिर्फ 42 वर्ष जिया लेकिन उसने जो लिखा वह अमर हो गया

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रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

ये पंक्तियाँ उस शायर की हैं जो आम आदमी के लिए, आम आदमी की आवाज बनकर आम आदमी की भाषा में लिखता था. इस क्रांतिकारी शायर का नाम था दुष्यंत कुमार, जो 30 दिसम्बर 1975 को महज 42 वर्ष की उम्र में दुनिया छोड़कर चला गया लेकिन जो भी लिख गया वह अमर होकर रह गया.

1 सितम्बर 1933 को उत्तरप्रदेश के बिजनौर में जन्मे दुष्यंत कुमार त्यागी की शायरी आजादी के बाद उपजे भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र के खिलाफ सबसे सशक्त आवाज थी जो उनके शेरों की शक्ल में आम आदमी की जुबान पर चढ़ गई.

निदा फाजली ने उनके लिए कहा है,”दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। ”

आज दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि के अवसर पर पढ़िये उनकी कुछ प्रतिनिधि गज़लें –

#1

हो गई है पीर परबत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए

आज ये दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

#2

कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिये, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।

यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से चलें उम्र भर के लिये।

न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढ़क लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिये।

खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिये।

जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले, मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये।

#3

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है।

हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.

दुष्यंत कुमार ने साहित्य की अन्य विधाओं जैसे नाटक, कहानी, उपन्यास आदि में भी लेखन किया लेकिन उन्हें सर्वशिक प्रसिद्धि उनकी शायरी ने दिलाई. ‘साए में धूप’ उनका बेहद प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह है.

आम आदमी की तकलीफों को शब्दों में उकेरने वाले इस महान शायर को हमारा शत शत नमन !

 

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