सुखी जीवन का मंत्र

सुखी जीवन का मंत्र

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एक संत हर रोज सत्संग किया करते थे। उनके सत्संग में दूर दूर से लोग उनकी बात सुनने आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने पर जब सभी लोग चले गए तो उन्होंने देखा कि एक आदमी अभी भी वहां बैठा है। संत ने उसे अपने पास बुलाया और सत्संग खत्म होने के बाद भी बैठे रहने का कारण पूछा तो वह बोला, “महाराज, मैं बहुत दुविधा में हूँ और आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। ”

संत ने कहा,’पूछो’ तो वह बोला,’मैं गृहस्थ हूँ, मेरे घर में बहुत कलह होती है, घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे यहाँ क्लेश क्यों होता है और वह कैसे दूर हो सकता है?’

संत ने उस आदमी को तुरंत इसका कोई जवाब नहीं दिया। वे थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्होंने घर के भीतर की ओर मुँह करके अपनी पत्नी को आवाज लगाई, ‘सुनती हो, ज़रा लालटेन जलाकर लाओ।’

संत की पत्नी लालटेन जलाकर ले आई। वह आदमी भौचक देखता रहा। सोचने लगा इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई ?

थोड़ी देर बाद संत ने फिर अपनी पत्नी को पुकारा,’कुछ मीठा दे जाओ।’ इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय कुछ नमकीन देकर चली गयी।

उस आदमी ने सोचा कि यह सब क्या हो रहा है। संत ने मीठा माँगा तो पत्नी नमकीन दे गयी, दिन में लालटेन मांगी तो बिना कुछ कहे लालटेन देकर चली गयी। उसने सोचा इन लोगों का तो खुद का ही दिमाग ठिकाने पर नहीं है, ये मेरी क्या मदद करेंगे और ये सोचकर वह बोला ,’ठीक है, महाराज मैं चलता हूँ।’

तब संत ने उस आदमी से पूछा,’आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी कुछ संशय बाकी है?’

वह व्यक्ति बोला,’मेरी समझ में कुछ नहीं आया।’

संत ने उसे समझाया ,’जब मैंने दिन में लालटेन मंगाई तो मेरी घरवाली कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो? इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत? लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं कहा, बल्कि उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगाई होगी। दूसरी बार मैंने जब मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गयी। तो मैं चुप रहा क्योंकि हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। हम दोनों चाहते तो अभी झगड़ सकते थे लेकिन आपसी विश्वास और समझ से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गयी।’

उस आदमी को हैरानी हुई। वह समझ गया कि संत ने यह सब उसे बताने के लिए किया था। संत ने फिर कहा,’ गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नज़रअंदाज़ कर दे। यही सुखी गृहस्थी का मूल मंत्र है।’

 

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