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वह आदमी कैसा होता है

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सड़क किनारे एक भिखारी बैठा हुआ था. उसने सूरत से ही सम्पन्न लगने वाले एक आदमी को अपनी ओर आते देखा तो कातर स्वर में बोला – “साहब, भगवान के लिए इस गरीब को रोटी खाने के लिए दो रुपये दे दीजिए … ”

आदमी यह सुनकर ठिठका, फिर बोला – “अबे, रोटी खाकर क्या करेगा, चल मैं तुझे व्हिस्की पिलाता हूँ !”

भिखारी – “नहीं साहब, मैं शराब नहीं पीता.”

आदमी – “तो ये ले सिगार पी … बीस रुपये का आता है ये !”

भिखारी – “नहीं नहीं साहब, मैं धूम्रपान नहीं करता .”

आदमी – “अच्छा तो फिर चल, मेरे साथ कैसीनो चल… मैं पैसे लगाऊंगा और तू खेलना. हो सकता है तू ढेर सारा पैसा जीत जाए !”

भिखारी – “राम राम, जुआ खेलना तो बहुत बुरी बात होती है साहब … ”

आदमी – “अच्छा तो फिर चम्पाबाई के कोठे पर चल, तुझे मुजरा दिखाकर लाता हूँ … ”

भिखारी – “नहीं साहब, मैं वेश्याओं के यहाँ नहीं जाता !”

आदमी – “ठीक है तो फिर एक बार मेरे घर तो चल … ”

भिखारी – “आपके घर क्यों साहब ?”

आदमी – “मैं अपनी बीवी को दिखाना चाहता हूँ कि जो आदमी शराब नहीं पीता, सिगरेट नहीं पीता, जुआ नहीं खेलता और बाजारू औरतों के पीछे नहीं घूमता … वह कैसा होता है !”

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