कुछ तो सोचना चाहिए था

कुछ तो सोचना चाहिए था

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एक भैंस के सींग बड़े सुन्दर और घुमावदार थे। एक मूर्ख उन सींगों को देख देखकर सोचा करता कि अगर मैं इनमें अपने पांव डाल दूं तो क्या हो ?

आखिर एक रोज उसने फैसला कर ही डाला और अपने पैर भैंस के सींगों में डाल दिये। इस पर भैंस फुनफुनाती हुई चौकड़ी भरती हुई भागने लगी। आदमी की हालत देखने लायक थी। आखिर बड़ी मुश्किल से भैंस रोकी गई। लोगों ने मूर्ख से पूछा –
      – तुम्हें ऐसी बेवकूफी करने के पहले कुछ तो सोचना चाहिए था !

      – आप ऐसा कैसे कहते हैं कि सोचा नहीं ! तीन महीने तक सोचते रहने के बाद ही मैंने यह काम किया है।
मूर्ख ने जवाब दिया।

 

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