वो जापानी सिपाही जो विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद भी 30...

वो जापानी सिपाही जो विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद भी 30 साल तक लड़ता रहा

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Hiroo Onoda  जापानी फौज का सिपाही था जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1944 में फिलिपींस में तैनात किया गया था. तैनाती के समय उसके कमांडर ने सभी सिपाहियों को आदेश दिया था कि मरते दम तक लड़ना है. कभी आत्मसमर्पण नहीं करना है और न ही खुद की जान लेनी है. इस सिपाही ने अपने कमांडर के ये शब्द दिल में उतार लिए और विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद भी 30 साल तक लड़ता रहा.

Hiroo Onoda की ड्यूटी फिलिपींस के एक आइलैंड लुबांग पर थी. आइलैंड पर फिलिपींस का दुबारा कब्जा हो गया तो Hiroo और उसके दो साथी पहाड़ियों में जाकर छिप गए. ये तीनों मिलकर वहीं से गुरिल्ला युद्ध का सञ्चालन करने लगे.

इस दौरान उन्हें कहीं से एक परचा मिला जिस पर लिखा हुआ था कि जापान 1945 में युद्ध हार गया है. लेकिन उन तीनों ने इसे दुश्मन की चाल समझा और अपना गुरिल्ला आक्रमण जारी रखा. आखिरकार 1949 में उन तीनों में एक ने फिलिपींस की पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

बचे दोनों को आत्मसमर्पण के लिए पुलिस द्वारा बहुत कोशिशें की गईं. जंगल में इनके परिवारों की तस्वीरें और पर्चे गिराए गए जिनपर लिखा हुआ था कि युद्ध समाप्त हो चुका है, अब छिपने से कोई फायदा नहीं लेकिन ये फिर उसे दुश्मन की चाल ही समझे.

बचे दोनों सिपाही अर्थात Onoda और उसका साथी जंगलों में घूमते 27 सालों तक पुलिस को छकाते रहे. आखिर 1972 में एक दिन पुलिस ने Onoda के साथी को मार गिराया. लेकिन Onoda बच निकला और जंगलों में जाकर छिप गया.

आखिर 1974 में एक जापानी टूरिस्ट ने Onoda को खोज निकाला. एक जापानी होने के नाते उसने Onoda को बहुत समझाने की कोशिश की कि युद्ध समाप्त हो गया है पर उसे विश्वास नहीं हुआ. आखिरकार उस टूरिस्ट ने जापानी सरकार को सूचित किया. सरकार ने फिर से उसी कमांडर को ढूँढा जो Onoda को मरते दम तक लड़ने का आदेश देकर गया था.

उस कमांडर ने अब रिटायर होकर किताबों की दूकान खोल ली थी. वह फिलिपींस आया और उसने जब उसे ड्यूटी से मुक्त करने का आदेश सुनाया तब कहीं जाकर Onoda माना. उसे जापान लाया गया जहां उसका नायक की तरह स्वागत हुआ.

द गार्डियन में छपे एक लेख के अनुसार जंगलों में अपने छिपने के इन सालों के दौरान उसने करीब 30 लोगों को दुश्मन का सिपाही समझ कर मार दिया. हालांकि उसे फिलिपींस सरकार की तरफ से माफ़ी मिल गई. मरने से पहले एक बार 1996 में फिर से वह लुबांग द्वीप गया जहां उसने एक स्कूल को 10 हजार डॉलर दान किये. 2014 में 90 साल की आयु में उसकी हृदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गई.

 

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