Home प्रेरक कहानियाँ (Motivational Stories) वो क्रांतिकारी, जिसका फोटो भगतसिंह अपनी जेब में रखकर घूमा करते थे

वो क्रांतिकारी, जिसका फोटो भगतसिंह अपनी जेब में रखकर घूमा करते थे

0

भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए न जाने कितने भारतीयों ने असीम कष्ट सहे और जानें कुर्बान कीं. आज जिनकी कुर्बानियों की बदौलत हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं उनमें से ज्यादातर के तो नाम भी नहीं जानते. ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे करतार सिंह सराभा, जो मात्र 19 साल की उम्र में इस देश की खातिर हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे. पर इनके बारे में आज की पीढ़ी को शायद ही मालूम हो.

पंजाब के लुधियाना जिले में एक गाँव है सराभा, इसी गाँव में करतार सिंह का जन्म 24 मई 1896 को पिता सरदार मंगल सिंह और माता साहिब कौर के घर हुआ था. छोटे ही थे कि पिता का देहांत हो गया और पालन पोषण की जिम्मेदारी आ गई दादा सरदार बदन सिंह पर.

खैर, शुरूआती शिक्षा लुधियाना में ही प्राप्त की और 9वीं के बाद अपने चाचा के पास उडीसा चले गए. उडीसा उन दिनों बंगाल प्रांत का हिस्सा हुआ करता था और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र था. इसी माहौल में उन्होंने मेट्रिक पास की और उसके बाद उनके परिवार ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेजने का निर्णय लिया.

पंद्रह वर्ष की अवस्था में करतार सिंह अमेरिका पहुँच गए और यहीं उनके भीतर भारत को आजाद कराने की इच्छा ने जन्म लिया. अमेरिका में एक गुलाम देश के नागरिक के रूप में कई बार अनादर का सामना करना पड़ा. एक दिन उन्होंने अपनी बुजुर्ग मकान मालकिन को अपना घर सजाते संवारते देखा तो पूछा कि आज क्या है. उस महिला ने बताया कि आज अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस है. उस रोज करतार सिंह को लगा कि हमारे देश का भी आजादी का दिन आना चाहिए.

अमेरिका में उनकी मुलाक़ात लाला हरदयाल से हुई जो वहाँ रहकर भारत की आजादी के लिए प्रयास कर रहे थे. 25 मार्च 1913 ऑरेगोन में भारतीयों की एक सभा हुई जिसे लाला हरदयाल ने संबोधित किया. संबोधन में लाला हरदयाल ने कहा, “मुझे ऐसे युवकों की आवश्यकता है जो देश की आजादी के लिए अपने प्राण दे सकें.” वहाँ बैठे करतार सिंह ने सबसे पहले अपने आपको उनके सामने प्रस्तुत कर दिया.

नवभारत टाइम्स

21 अप्रैल 1913 को अमेरिका में ग़दर पार्टी की स्थापना हुई और ‘ग़दर’ नामक साप्ताहिक अखबार निकालने का फैसला किया जिसकी जिम्मेदारी करतार सिंह सराभा को सौंपी गई. इस अखबार में क्रांतिकारियों के लेखा और जोशीली कवितायें छपा करती थीं. अब करतार सिंह पूरी तरह से क्रान्ति के रंग में रंग चुके थे और उनके संपर्क उस समय के अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि से हो गए.

ग़दर पार्टी ने अंग्रेजों के खिलाफ एकसाथ विद्रोह करने के लिए एक बड़ी योजना बनाई. तय हुआ कि पूरे भारत में समस्त फौजी छावनियां एक ही दिन एक साथ अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह करेंगी. परन्तु अफ़सोस कि योजना की भनक अंग्रेजों को लग गई और विद्रोह नाकाम कर दिया गया. षड्यंत्र के आरोप में करतार सिंह सराभा और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया.

16 नवम्बर 1915 का मनहूस दिन था जब मात्र साढ़े उन्नीस साल के करतार सिंह सराभा और उनके 6 साथी बख्शीश सिंह, (ज़िला अमृतसर); हरनाम सिंह, (ज़िला स्यालकोट); जगत सिंह, (ज़िला लाहौर); सुरैण सिंह व सुरैण, दोनों (ज़िला अमृतसर) व विष्णु गणेश पिंगले, (ज़िला पूना महाराष्ट्र)- के साथ लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया.

करतार सिंह सराभा ग़दर पार्टी के उसी तरह नायक थे जैसे भगत सिंह 1925-31 के बीच हुए आन्दोलन के नायक बने. खुद भगत सिंह करतार सिंह सराभा से बेहद प्रभावित थे. कहते हैं कि वे करतार सिंह की एक ग़ज़ल हमेशा गुनगुनाया करते थे और उनका चित्र हमेशा अपनी जेब में रखते थे.

करतार सिंह सराभा की वह लोकप्रिय ग़ज़ल, जो भगत सिंह को विशेष प्रिय थी, यह है –
“यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,
मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा;
मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,
यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा;
मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,
यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा;
मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा;
तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,
तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा.”

(Source)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here