18 साल का क्रांतिकारी, जिसने फाँसी की सजा सुनने के बाद भी...

18 साल का क्रांतिकारी, जिसने फाँसी की सजा सुनने के बाद भी अंग्रेज जज से ऐसी बात कही कि

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भारत की आजादी की लड़ाई में अनेकों भारतीयों ने अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं थीं. आजादी को लेकर उस समय भारतीयों का जूनून कुछ ऐसा था कि लोग फाँसी की सजा को अपना सौभाग्य मानते थे. ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे खुदीराम बोस. वे अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम के क्रांतिकारी थे. जब उन्हें फाँसी हुई तब वे मात्र 19 साल के थे.
30 अप्रैल 1908 का दिन. खुदीराम बोस और प्रफुल्लकुमार चाकी को अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड का काम तमाम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. दोनों को बम और पिस्तौल दिए गए. योजना के अनुसार उन्हें किंग्सफोर्ड की घोड़ागाड़ी पर बम फेंकना था जब वह उसमें बैठा हो. रात साढ़े आठ बजे के आसपास जब किंग्सफोर्ड की गाड़ी क्लब से निकली तो उन्होंने उस पर बम फेंक दिया. दैवयोग से उस दिन उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं था बल्कि दो अंग्रेज महिलायें सवार थीं. दोनों महिलायें और घोड़ागाड़ी चालक बम विस्फोट में मारे गए.

ये भारत का पहला बम विस्फोट था जिसकी गूँज उस समय तीन मील दूर तक सुनाई दी थी लेकिन बाद में इंग्लैंड तक सुनी गई. अंग्रेज पुलिस फ़ौरन उनके पीछे लग गई और वेनी स्टेशन पर दोनों को घेर लिया. प्रफुल्ल कुमार चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए लेकिन खुदीराम पकडे गए.
18 साल के नौजवान पर मुकदमा चलाने का पूरा नाटक किया गया. जज ने पूछा, “तुमने अपराध किया है नहीं ?”
वीर खुदीराम तपाक से बोले, “हाँ मैंने किया है.”
खुदीराम की इस त्वरित स्वीकारोक्ति के बाद भी अंग्रेजों ने न्याय की प्रक्रिया का नाटक जारी रखा. खुदीराम इतने निर्भीक और मुक़दमे की कार्रवाई से निर्लिप्त थे कि एक बार तो उनके वकील ने उनसे चिढ़कर कहा, “हम इतने वकील तुम्हें बचाने के लिए रंगपुर से यहाँ आये हुए हैं और तुम अपना अपराध पहले ही स्वीकार किये बैठे हो.”
खुदीराम अपने चिरपरिचित निश्चिन्त अंदाज़ में बोले, “क्यों स्वीकार न करूं ?”
हालांकि वकीलों ने फिर भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश की और यह सिद्ध करना चाहा कि बम खुदीराम ने नहीं बल्कि प्रफुल्ल ने फेंका था लेकिन कुछ तो खुदीराम का असहयोग और कुछ अंग्रेज जज की उन्हें सजा देने की चाहत, आखिरकार उन्हें फांसी की सजा सुना ही दी गई.
सजा सुनाने के बाद जज ने खुदीराम से कहा, “तुम्हें जो सजा सुनाई गई है वह तुम समझ गए न ?”
खुदीराम ने कहा, “जी हाँ, समझ गया.”
जज ने कहा, “तुम चाहो तो इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हो. तुम्हें और कुछ कहना है.”
इस पर खुदीराम बोले, “हाँ, मुझे सबके समक्ष कुछ कहना है. अगर आप मुझे थोड़ी देर बोलने का समय दें तो मैं इस अदालत में बैठे लोगों को बताना चाहता हूँ कि बम कैसे बनाया जाता है.”
इतना सुनते ही अंग्रेज जज की हवा निकल गई और उसने तुरंत खुदीराम को कटघरे से निकाल कर जेल ले जाने का आदेश दे दिया.

(स्रोत : पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन’)

 

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