जब ग़ालिब ने दी थी पाँव दबाने की मजदूरी

जब ग़ालिब ने दी थी पाँव दबाने की मजदूरी

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मिर्ज़ा ग़ालिब, एक ऐसा शायर, जिसके जैसा न उसके पहले कोई हुआ था और न बाद में हो पाया है. 27 दिसम्बर 1797 को आगरा में जन्मे असदुल्लाह, जो बाद में ‘ग़ालिब’ के नाम से मशहूर हुए, ने उर्दू शायरी को उन बुलंदियों तक पहुंचाया जिसे छूना किसी दूसरे शायर के लिए नामुमकिन सा लगता है.

उनके बारे में एक शेर सर्वाधिक प्रचलित है –

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और

और ये शेर उनके ऊपर बिलकुल सटीक भी है. ग़ालिब का बात कहने का अंदाज़, उनकी हाजिर जवाबी अद्भुत थी. उनके जीवन काल के कई मनोरंजक किस्से भी प्रचलित हैं जो उनके मजाकिया अंदाज़ को दर्शाते हैं. पढ़िये कुछ मजेदार किस्से –

जब ग़ालिब ने की अपनी मौत की तारीख मुक़र्रर

अपने आखिरी दिनों में ग़ालिब की तबीयत बहुत खराब रहती थी. ऐसे में मरने की आरजू करते हुए अपनी मौत की तारीखें मुक़र्रर किया करते थे. होता ये कि तारीख निकल जाती और फिर दूसरी तारीख मुकर्रर की जाती.

एक बार ऐसा ही कर रहे थे कि तभी किसी ने कहा कि ‘इंशाअल्लाह यह तारीख भी गलत साबित होगी’. इस पर ग़ालिब बोले, “देखो मियाँ, औल-फौल न बको, अगर ये तारीख गलत हुई तो मैं सर फोड़ कर मर जाऊँगा.”

मरने की ख्वाहिश से जुड़ा एक और प्रसंग है. उन दिनों दिल्ली में जबरदस्त महामारी फैली. किसी ने ग़ालिब को इसके बारे में बताया तो ग़ालिब ने तंज भरे लहजे में जवाब दिया, “भई कैसी वबा ? जब सत्तर बरस के बूढ़े को न मार सकी ?”

Ghalib Institute

तुमने हमारे दाबे, हमने तुम्हारे दाबे

बुढ़ापे में ग़ालिब के शरीर में बहुत दर्द रहता था जिस कारण वे अक्सर कराहते रहते थे. एक उनके एक चहेते शागिर्द मजरूह उनके पास बैठे थे. उन्होंने ग़ालिब मियाँ को कराहते देखा तो उनके पैर दबाने लगे. ग़ालिब ने उन्हें पैर दबाने से रोकने लगे.

इस पर मजरूह ने कहा, “अगर आपको मुझसे पैर दबवाना अच्छा नहीं लग रहा तो आप मुझे पैर दबाने की मजदूरी दे दीजियेगा.”

चलते वक़्त मजरूह ने हंस कर कहा, “लाइए मेरी पैर दबाने की मजदूरी”.

ग़ालिब बोले, “कैसी मजदूरी, तुमने हमारे पाँव दाबे, हमने तुम्हारे पैसे दाबे ! हिसाब बराबर !”

Ghalib Institute

ग़ालिब के जूते

एक बार ग़ालिब के घर उनके एक दोस्त सय्यद सरदार मिर्ज़ा मिलने पधारे. चलने लगे तो अँधेरा हो चुका था. ग़ालिब हाथ में शमादान लेकर आये ताकि मिर्जा साहब रौशनी में जूते पहन सकें. सरदार मिर्जा बोले, “आपने क्यूँ तकलीफ की, मैं अपना जूता आप पहन लेता.”

ग़ालिब बोले, “मैं आपका जूता दिखाने को शमादान नहीं लाया. मैं खुद ये देखने के लिए लाया हूँ कि कहीं अँधेरे का फायदा उठाकर आप मेरा जूता न पहन जाएँ.”

सरदार साहब यह सुनकर ठठाकर हंस पड़े.

 

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