उल्लू की सीख – Funny story

उल्लू की सीख – Funny story

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एक बार एक हंस और हंसिनी मानसरोवर से दुनिया देखने के लिए चले और भटक कर  किसी बियाबान  रेगिस्तानी इलाके में आ  पहुँचे.

रात हो चली थी. किसी तरह एक  पेड़ दिखा  तो उसके नीचे विश्राम करने लगे.

हंसिनी बोली – “ये किस उजाड़ जगह पर लेकर आ गए हो ? … यहाँ ना तो जल है ना जंगल है और ना ही ठण्डी हवाएं है … ”

हंस बोला – “बस आज की रात किसी तरह काट लो … सुबह होते ही हम वापस मानसरोवर चले जायेंगे”.

जिस पेड़ के नीचे हंस-हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था. रात होते ही वह जोर-जोर से चीखने लगा.

हंसिनी बोली – “यहाँ तो सो भी नहीं सकते … ये उल्लू कितनी जोर से चिल्ला रहा है.”

हंस ने कहा – “अब जैसे भी हो आज की रात तो काटनी ही पड़ेगी… लेकिन आज मुझे समझ में आ गया है कि यह इलाका इतना उजाड़ और बियाबान क्यों है ? जिस जगह ऐसे उल्लू रहते हों वह जगह आबाद  हो भी कैसे सकती है ???”

उल्लू उन दोनों की बातें सुन रहा था पर उस वक्त उसने कुछ नहीं कहा, बस अपने स्वभाव के अनुसार रह-रह कर चिल्लाता रहा.

सुबह होते ही उल्लू पेड़ से नीचे आया और बोला – “हंस भाई, मै माफ़ी चाहता हूँ कि मेरी वजह आप लोगों को रात में बहुत तकलीफ हुई. आप ठीक से सो नहीं सके …”.

हंस बोला – “कोई बात नहीं भाई … आपका धन्यवाद !”

लेकिन जैसे ही हंस हंसिनी को लेकर चलने लगा, उल्लू पीछे से चिल्लाया – “अरे भैया हंस, मेरी पत्नी को लेकर कहां जा रहे हो … ?”

हंस चौंक कर बोला – “तुम्हारी पत्नी …? अरे भाई ये हंसिनी है, मेरी पत्नी … मेरे साथ आई थी और मेरे ही साथ जा रही है …”.

उल्लू अकड़ कर बोला – “खामोश रहो … ये मेरी पत्नी है … ”

दोनों में वाद-विवाद होने लगा. पास के गाँव के लोग इकठ्ठा हो गए. मामला और बढ़ा तो निर्णय करने के लिए पंचायत बुलाई गई.

पंचों ने पूछा – “किस बात का विवाद है ?”

किसी ने बताया कि हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है लेकिन उल्लू कहता है कि हंसिनी उसकी पत्नी है.

लंबी बैठक और विचार-विमर्श के बाद पंच लोग आपस में कानाफूसी करने लगे कि भाई सही बात तो ये है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है लेकिन …. हंस आखिर है तो परदेसी ही ! उल्लू जैसा भी है  हमारा अपना है और हमें उसी के साथ रहना है ….

आखिरकार पंचायत ने अपना फैसला सुनाया – “हम लोग इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को फ़ौरन यह गाँव छोड़ने का आदेश दिया जाता है … !”

फैसला सुनते ही हंस रोने – चिल्लाने लगा कि पंचायत ने उसके साथ अन्याय किया है पर किसी ने भी उसकी नहीं सुनी.

आखिर दुखी मन से वह हंसिनी को उल्लू के पास छोड़ वहाँ से चल दिया. पीछे से उल्लू ने आवाज़ लगाईं – “अरे भाई हंस, कहां चल दिए ? ज़रा रुको तो … !”

हंस रुआंसा होकर बोला – “अब क्या बात है ? पत्नी तो छीन ली अब क्या जान भी लोगे ?”

उल्लू हंसकर बोला – “नहीं भाई, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी ! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है ! लेकिन  मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है बल्कि  यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच  रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं !”

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