‘नज़ीर बनारसी’ की ये ग़ज़ल आपकी होली की मस्ती में थोड़े रंग...

‘नज़ीर बनारसी’ की ये ग़ज़ल आपकी होली की मस्ती में थोड़े रंग और घोल देगी

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होली मस्ती का त्यौहार है, रंगों का त्यौहार है. होली के त्यौहार पर साहित्य में भी बहुत से साहित्यकारों ने कई रचनाएं लिखी हैं इसके आनंद को कई गुना बढ़ा देती हैं. आज हम आपको प्रख्यात उर्दू शायर ‘नज़ीर बनारसी’ की एक ग़ज़ल से रूबरू कराने जा रहे हैं जो आपकी होली की मस्ती को थोड़ा और रंगीन बना देगी.

अगर आज भी बोली-ठोली न होगी
तो होली ठिकाने की होली न होगी

बड़ी गालियाँ देगा फागुन का मौसम
अगर आज ठट्ठा ठिठोली न होगी

वो खोलेंगे आवारा मौसम के झोंके
जो खिड़की शराफ़त ने खोली न होगी

है होली का दिन कम से कम दोपहर तक
किसी के ठिकाने की बोली न होगी

अभी से न चक्कर लगा मस्त भँवरे
कली ने अभी आँख खोली न होगी

ये बूटी परी बन के उड़ने लगेगी
ज़रा घोलिए फिर से घोली न होगी

इसी जेब में होगी फ़ित्ने की पुड़िया
ज़रा फिर टटोलो टटोली न होगी

‘नज़ीर’ आज आएँगे मिलने यक़ीनन
न आए तो आज उन की होली न होगी

(नज़ीर बनारसी)

HAPPY HOLI !!

 

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