दो पैसे के अनार

दो पैसे के अनार

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मारवाड़ के किसी गाँव में जय और विजय नामक दो व्यक्ति आपस में बड़े मित्र थे. एक दिन गरीबी से दुःखी होकर दोनों ही रोज़गार की खोज में दिल्ली चले आये.
दिल्ली आकर जय ने तो शाही बावर्चीखाने में नौकरी कर ली जहाँ वेतन के अतिरिक्त नाना-प्रकार के स्वादिष्ट खाने मिलते थे. इसके अतिरिक्त ऊपरी आमदनी भी काफी थी. अतः थोड़े समय में ही वह खूब हृष्टपुष्ट और धनवान हो गया.
विजय बेचारा किसी वज़ीर के यहाँ खाना पकाने पर मुलाज़िम हो गया. वज़ीर साहिब ईमान के पक्के आदमी थे. कुछ दस्तकारी करते थे और उससे जो कुछ पैदा होता, उसी से उनकी रसोई का खर्च चलता था. केवल एक प्रकार की दाल और रोटी ही उनकी रसोई में पकती थी. विजय को वेतन भी हर महीने नहीं मिल पाता था तथा भोजन भी पौष्टिक नहीं था अतः वह कमज़ोर हो गया.
जब दोनों मित्र आपस में मिलते तो जय उस विजय से मज़ाक करता कि तुमने कैसे कंजूस के यहाँ नौकरी की है. यह सुनकर विजय चुप रहता. मन ही मन वह ऐसी शान्ति और सन्तोष अनुभव करता कि उसे कभी अधिक धन कमाने का लालच पैदा ही नहीं हुआ.
जय ने जब खूब धन एकत्र कर लिया तो वहां से अवकाश लेकरअपने घर जाने का विचार किया. यात्रा की तिथि निश्चित करके विजय से भी पूछा कि यदि तुम्हारा विचार हो तो मेरे साथ चलो. विजय ने वज़ीर साहिब से विदा मांगी परन्तु उन्होंने स्वीकार न किया. जब चलने का दिनआया तो विजय ने विनय की,””हुज़ूर! मेरा एक मित्र घर जा रहा है। यदि आज्ञा हो तो बच्चों के लिए कुछ भेज दूँ?”
वज़ीर साहिब ने जेब में हाथ डाला. संयोग से उस समय केवल दो पैसे उनकी जेब में थे. वे उन्होने निकाल कर विजय को दे दिये. गरीब विजय बड़े आदमी से क्या कह सकता था. दो पैसे जेब में डालकर खामोश हो गया, सोचा कि मित्र से जाकर मिल तो लें. बाज़ार से गुज़र रहा था कि अनार बिकते हुये दिखाई पड़े.
सोचा कि मारवाड़ में अनार बिल्कुल नहीं होते, यही भेज देने चाहियें. दो पैसों में दस बारह अनार मिल गये. वह ले जाकर उसने अपने मित्र को दे दिये और सारा वृत्तान्त सुना दिया.
जय यात्रा करते करते जब मारवाड़ पहुँचा तो किसी बड़े शहर में रात्रि को ठहरा. वहाँ सराय में चोरों ने उसका सारा धन-माल चुरा लिया. अनार कपड़े में बँधे हुये खूँटी पर टँगे थे, उनपर किसी की दृष्टि न पड़ी. बेचारा सुबह उठा तो अपना धन-माल न पाकर अत्यन्त दुःखी हुआ कि अब क्या करे और किस प्रकार घर पहुँचे?
संयोग की बात कि उस शहर में जो सबसे बड़ा साहुकार था, उसका इकलौता लड़का बहुत सख्त बीमार था और किसी भयानक रोग से पीड़ित था. हकीम ने बताया कि अगर इसको अनार के दाने तत्काल खिलाये जायें तो इसके जीवन की आशा है. ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि कोई अनार लाकर देगा, उसको बहुत धन दिया जायेगा.
जय ने इस अवसर को गनीमत समझा और तुरन्त वे अनार ले जाकर सेठ को दे दिये. जब वहअनार उस लड़के को खिलाये गए तो ईश्वर की कृपा से वह स्वस्थ हो गया. उस साहुकार ने बहुत सा धन उन अनारों के बदले में दिया. उन रुपयों में से खर्च करते हुए वह जय अपने घर पहुँचा.
जितना धन शेष बचा था,वह सब विजय के घर वालों को दे दिया. मार्ग की कठिनाइयों व धन प्राप्ति का सब हाल लिख कर विजय के पास भी भेज दिया और यह भी लिख दिया कि अब तुमको नौकरी करने की आवश्यकता नहीं है. पर्याप्त धन मिल गया है, घर वापिस चले आओ.
विजय ने सारी बात वज़ीर महोदय को बतला कर विनती कि कि ये दो पैसे आपने कैसे दिये थे कि जिनके बदले इतना धन प्राप्त हो गया. वज़ीर ने उत्तर दिया कि मैं शाहीकोष को अपने निजी खर्च में बिल्कुल नहीं लाता. अपनी दस्तकारी और परिश्रम की कमाई से जो पैसा बनता है,उसीसे काम चलता हूँ. तुमने बहुत ईमानदारी से काम किया था, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि शाही कोष से तुमको वेतन दिया जाये. सो मैने अपनी मेहनत की कमाई में से ही दो पैसे दे दिये थे. परन्तु मैं इस बात को भी जानता था कि वे दो पैसे तुम्हारे पूरे जीवन के लिए पर्याप्त होंगे. अब यदि तुम घर जाना चाहो तो बड़ी प्रसन्नता से जा सकते हो.
विजय उनसे विदा लेकर जब घर आया तो जय ने उन रुपयों के लिए जो यात्रा में उसने खर्च किये थे,क्षमा मांगी. विजय ने कहा कि जो कुछ रूपया तुम वसूल करके लाए हो, उसमें से तुमआधे भाग का अधिकार रखते हो, क्योंकि यदि तुम किसी प्रकार की ख्यानत करते तो मुझे क्या मालूम हो सकता था? वास्तव में उन दो पैसों में से जो मेरे वेतन में मुझे मिले है, केवल एक पैसा ही मेरी आयु के लिए काफी होगा. शेष एक पैसा तुम अपने काम में लाओ. इस प्रकार उस नेक कमाई से उन दोनों ने ही लाभ उठाया।

 

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