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शेरो-शायरी



बदलते वक्त का इक सिलसिला सा लगता है
कि जब भी देखो उसे दूसरा सा लगता है
- मंजर भोपाली





पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात खैरात की, सदके की सहर होती है
- मीनाकुमारी





अक्ल पे हम को नाज बहुत था लेकिन ये कब सोचा था
इश्क के हाथों ये भी होगा लोग हमें समझायेंगे
- अहमद हमदानी





क्यूंकर हुआ है फाश जमाने पे क्या कहें
वो राज-ए-दिल जो कह न सके राजदां से हम
-मजाज लखनवी





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