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शेरो-शायरी



यूं इस कदर हवा नहीं चलती
उसे तो सिर्फ हमारा दिया बुझाना था
- प्रफुल्ल चंद्र पाठक




उठे कभी घबरा के तो मैखाने में हो आए
पी आए तो फिर बैठ रहे याद-ए-खुदा में
- रियाज




आए कुछ अब, कुछ शराब आए
इसके बाद आए जो अजाब आए
- फैज अहमद ''फैज''




वीरां है मैकदा खुम-ओ-सागर उदास है
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
- फैज अहमद ''फैज''




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