खुद एक किडनी का इंतज़ार करते-करते मर गई, पर अपनी आँखें दान...

खुद एक किडनी का इंतज़ार करते-करते मर गई, पर अपनी आँखें दान कर गई

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अंगदान का महत्व उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता जिसका खुद का, या जिसके परिवार में किसी का कोई अंग खराब हो. शायद यही वजह रही होगी तभी तो दो साल से किसी किडनी डोनर का इंतज़ार कर रही सुतपा बोस की जब असमय मृत्यु हो गई तो उनके परिवार वालों ने सुतपा के अंग दान करने का फैसला लिया.

कोलकाता की रहने वाली 36 वर्षीय सुतपा बोस को करीब डेढ़ साल पहले किडनी खराब होने का पता चला था और डॉक्टर ने उन्हें जल्दी से जल्दी किडनी ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी थी. तभी से उनके परिवार वाले किसी दानदाता की तलाश में लगे थे. पर ये तलाश इतनी आसान नहीं होती.

जैसे तैसे काफी वक़्त बीतने के बाद किडनी का इंतजाम तो हो गया परन्तु ट्रांसप्लांट फिर भी नहीं हो सका क्योंकि इसके लिए अभी कुछ वक़्त कागज़ी कार्यवाही में और लगना था. कुल मिला कर इस महीने के अंत में ट्रांसप्लांट होने वाला था, मगर इससे पहले ही सुतपा को cardiac arrest हुआ और वे दुनिया छोड़ गईं.

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असीम दुख की इस घड़ी में भी उनके पति अमिताभ और पिता अजित पाल सहित पूरे परिवार ने डॉक्टर से सुतपा के अंगों को दान करने की पेशकश की. सुतपा के परिवार का यह फैसला सुनकर डॉक्टर स्तब्ध रह गए. उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनका एक मरीज, जो खुद समय पर अंग न मिल पाने की वजह से दुनिया छोड़ कर जा चुका है, उसके घरवाले उसके अंग दान करना चाहते हैं !

परन्तु परिवार अपने फैसले पर अडिग था. आखिरकार फ़ौरन आई हॉस्पिटल से टीम बुलवा कर सुतपा की आँखों से कॉर्निया सुरक्षित निकाल लिया गया. समय की कमी के कारण अन्य अंगों का दान संभव नहीं हो सका. अंगदान की प्रक्रिया मृत्यु से चार घंटे के भीतर ही की जा सकती है.

बहरहाल सुतपा की आँखों से अब दो लोगों को रौशनी मिल सकेगी.

दुःख की घड़ी में भी इस महादान के लिए सुतपा के परिवार वालों को कोटि कोटि साधुवाद …

(News : TOI)

 

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