शेर, लोमड़ी और शिष्य

शेर, लोमड़ी और शिष्य

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किसी जंगल में एक गुरु अपने एक शिष्य के साथ रहते थे. एक बार किसी काम से गुरूजी कुछ दिनों के लिए बाहर चले गए तो आश्रम में शिष्य अकेला रह गया.

एक दिन जब शिष्य भोजन बनाने के लिए जंगल में लकडियाँ चुन रहा था तभी उसने वहाँ एक लोमड़ी देखी जिसके पैर ही नहीं थे.

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“आखिर ये जिंदा कैसे है ? खाने का इंतजाम कैसे करती होगी जब ये चल ही नहीं सकती … ?”, शिष्य अभी ये सोच ही रहा था कि तभी जंगल में एक हलचल सी उठी. सभी जानवर इधर-उधर भागने लगे.

शिष्य ने भी ध्यानपूर्वक देखा तो उसे सामने से एक शेर धीरे-धीरे अपनी ओर आता दिखाई दिया. शेर को देखते ही वह फ़ौरन एक पेड़ पर चढ़ गया और वहीं से सब कुछ देखने लगा.

शेर  ने  एक हिरन  का  शिकार  किया  था  और  उसे  अपने  जबड़े  में  दबा  कर  लोमड़ी  की  तरफ   बढ़  रहा  था, पर  उसने  लोमड़ी   पर  हमला  नहीं  किया  बल्कि  उसे  भी  खाने के  लिए  मांस  के   कुछ  टुकड़े  डाल  दिए.

शिष्य यह देखकर हैरान रह गया और उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. उत्सुकतावश वह अगले दिन फिर उसी जगह आया और पेड़ पर चढ़ कर देखने लगा.

फिर वैसा ही हुआ. शेर आया और उसने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी को दिया.

“यह ईश्वर के मौजूद होने का साक्षात प्रमाण है !” शिष्य ने  अपने  आप  से  कहा . “ वह जिसे पैदा करता है उसके भोजन का भी इंतजाम कर देता है. मैं मूर्ख खामखाँ अपने भोजन की व्यवस्था करने में लगा रहता हूँ.  आज  से  इस  लोमड़ी  की  तरह  मैं  भी  ईश्वर  की दया पर जीऊंगा, वही मेरे  भी  भोजन   की  व्यवस्था करेगा .” और  ऐसा  सोचते  हुए वह अपने आश्रम में आकर बैठ गया.

एक दिन गुजरा, पर वहाँ कोई नहीं आया. दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ. आसपास से कई लोग गुजरे पर शिष्य को किसी ने नहीं पूछा. कुछ न खाने के कारण  धीरे-धीरे उस पर कमजोरी छाने लगी.

दो-तीन दिन इसी तरह और गुजरे और वह चलने-फिरने के लायक भी नहीं बचा. उसकी मृत्यु निकट ही थी कि तभी अचानक उसके गुरूजी यात्रा समाप्त कर लौट आये.

गुरूजी ने शिष्य को इस अवस्था में देख इसका कारण पूछा. उसने धीरे-धीरे उन्हें अपनी पूरी कहानी कह सुनाई और फिर बोला – “अब  आप  ही  बताइए कि  जब भगवान उस लोमड़ी के भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं तो मेरी क्यों नहीं ? क्या मुझे उन्होंने नहीं बनाया है ?”

“ बिल्कुल बनाया है…”, गुरुजी ने  कहा , “लेकिन  तुम इतना  मूर्ख  कैसे  हो  सकते  हो ? तुम  ये  क्यों  नहीं  समझे  कि  भगवान  तुम्हे  उस  शेर  की  तरह  बनते  देखना  चाहते  थे, लोमड़ी  की  तरह  नहीं !!”

 

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