जीते जी भारत न देख सका, पर मरणोपरांत स्टीव वॉ ने उसकी...

जीते जी भारत न देख सका, पर मरणोपरांत स्टीव वॉ ने उसकी इच्छा पूरी कर दी

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ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और महान खिलाड़ी स्टीव वॉ मंगलवार को बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में दिखे. काशी यानी बनारस में उनका यह आगमन किसी क्रिकेट इवेंट की वजह से नहीं बल्कि एक नितांत निजी और भावुक वजह से हुआ था.

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दरअसल स्टीव वॉ सिडनी के एक बेहद गरीब किन्तु लोकप्रिय व्यक्ति ब्रायन रूड की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने आये थे. ब्रायन सिडनी के सेंट्रल स्टेशन, मार्टिन प्लेस और पिट स्ट्रीट मॉल जैसी जगहों पर जूते पॉलिश किया करते थे.

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ब्रायन के मन में भारत को लेकर शुरू से ही एक आकर्षण था और वे पूरी ज़िन्दगी चाहते रहे कि वे एक बार भारत होकर आयें, पर जीते जी उनके लिए यह संभव नहीं हो सका. हाँ, मरणोपरांत उनकी यह इच्छा स्टीव वॉ के माध्यम से जरूर पूरी हो गई है.

ब्रायन यूँ तो जूते पॉलिश करते थे, गरीब और बेघर थे लेकिन सिडनी का एक जाना पहचाना चेहरा थे. उनके बेहद दयालु और मिलनसार स्वभाव के कारण वहाँ के आम लोगों के अलावा गरीब और बेघर तबके में उन्हें सब बहुत मानते थे. मरने से कुछ रोज पहले ब्रायन ने मेलबोर्न के एक पादरी से कहा था कि उनकी इच्छा है कि मरणोपरांत उनकी अस्थियाँ हिन्दू रीति रिवाज से गंगा में विसर्जित की जाएँ.

ब्रायन की मौत के बाद पादरी ने जब उनकी अंतिम इच्छा के बारे में लोगों को बताया तो आप यकीन नहीं करेंगे कि उनकी अस्थियाँ भारत लाने के इच्छुक लोगों की भीड़ लग गई. यहाँ तक कि  स्टीव वॉ को यह जिम्मेदारी खुद लेने के लिए कई लोगों को दरकिनार करना पड़ा.

जन्म से अनाथ और बेहद गरीब ब्रायन ने अपनी 58 साला ज़िन्दगी में कभी भीख नहीं मांगी, जूते पॉलिश करना स्वीकार किया और ज़िन्दगी की हर मुश्किल को खामोशी से सहन किया. वह हमेशा अपने ग्राहकों को हँसाते रहते थे और कभी कभी यदि कोई सुनना चाहता था तो अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाकर भावुक भी कर देते थे.

स्टीव वॉ और ब्रायन के बीच हैसियत का कोई साम्य दूर दूर तक नहीं है, लेकिन इंसानियत का एक ऐसा नाता है जिसके धरातल पर सब बराबर हैं. एक गरीब की अंतिम इच्छा के सम्मान का यह पुनीत कार्य करने के लिए स्टीव वॉ अभिनन्दन के पात्र हैं.

 

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