कहीं आप भी भगवान की हँसी तो नहीं उड़ाते ?

कहीं आप भी भगवान की हँसी तो नहीं उड़ाते ?

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प्राचीन काल में अष्टावक्र नामक एक परम तपस्वी ऋषि थे. परन्तु उनका शरीर कई जगह से टेढ़ा-मेढ़ा अजीब सा था, और इसी कारण उनका अष्टावक्र पड़ा था.

एक दिन जब ऋषि अष्टावक्र किसी कार्य वश राजा जनक की सभा में पहुंचे तो उनके शरीर की विचित्र बनावट देखकर सभा के सभी सदस्य हँसने लगे. ऋषि अष्टावक्र सभा के सदस्यों को हंसता देखकर वापस लौटने लगे.

ashtavakra

यह देखकर राजा जनक ने ऋषि अष्टावक्र से पूछा-‘‘ऋषिवर ! वापस क्यों जा रहे है?”

ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया- ‘‘मैं मूर्खों की सभा में नहीं बैठता…’’

ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर सभा के सदस्य नाराज हो गए और उनमें से एक सदस्य ने क्रोध में पूछ ही लिया- ‘‘हम मूर्ख क्यों हुए? आपका शरीर ही ऐसा है तो हम क्या करें’’

तब ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया – ‘‘तुम लोगों को यह नहीं मालूम कि तुम मुझ पर नहीं, सर्वशक्तिमान ईश्वर पर हँस रहे हो। मनुष्य का शरीर तो हांडी की तरह है जिसे ईश्वर रूपी कुम्हार ने बनाया है। हांडी की हंसी उड़ाना क्या कुम्हार की हंसी उड़ाना नहीं हुआ?’’

अष्टावक्र का तर्क सुनकर सभी सभा सदस्य लज्जित हो गए और उन्होंने ऋषि अष्टावक्र से क्षमा मांगी.

(मुझे उम्मीद है अब से आप किसी की हँसी उड़ाने से पहले इस प्रसंग को जरूर याद कर लेंगे.)

 

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