शून्य पर आउट होने को ‘डक’ क्यों कहा जाता है ?

शून्य पर आउट होने को ‘डक’ क्यों कहा जाता है ?

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क्रिकेट का इतिहास जितना पुराना है उतने ही पुराने इससे जुडी शब्दाबली है जो अक्सर हमे मैच के दौरान सुनने को मिल जाती है आइये जानते है ऐसे ही एक रोचक तथ्य के बारे में..

जब कोई बल्लेबाज अपनी पारी में बिना कोई रन बनाये या कहे की बिना खाता खोले गेंदबाज का शिकार बन जाता है तो उस स्थिति को क्रिकेट की भाषा में ‘डक’ कहा जाता है.आखिर क्या है इसके मायने और इसकी शुरुआत कब हुई..

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माना जाता है कि 17 जुलाई 1866 को एक मैच के दौरान प्रिंस ऑफ़ वेल्स शून्य रन पर आउट होकर पवेलियन लौट गये थे जिसके बाद एक अखबार ने मजाकिया ढंग से खबर छापी की,”प्रिंस बतख के अंडे पर सवार होकर रॉयल पवेलियन लौट गये” इसके बाद क्रिकेट जगत में ‘डक’ शब्द प्रचलित हो गया और शर्मिंदगी का प्रतीक बन गया.

अगर कोई बल्लेबाज बिना किसी गेंद का सामना किये रन आउट हो जाये तो उसे ‘डायमंड डक’ कहा जाता है जो की डक के मामले में सबसे ऊँची उपाधि है.ठीक ऐसे ही किसी टीम का ओपनर बल्लेबाज यदि शून्य पर आउट हो जाता है तो उसे ‘रॉयल डक’ कहा जाता है.जब बल्लेबाज अपनी पारी की पहली गेंद पर आउट हो जाये तो इसे ‘गोल्डन डक’ कहा जायेगा.

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अंतररास्ट्रीय क्रिकेट में इस अनचाहे रिकॉर्ड की बात करे तो इसमें सबसे आगे वेस्टइंडीज के खिलाडी कोर्टनी वाल्स है जो अपने करियर के 132 मैचो के दौरान सबसे ज्यादा 43 बार डक आउट हुए.दूसरे नंबर पर न्यूजीलैंड के खिलाडी क्रिस मार्टिन का नाम आता है जो कुल 36 बार डक आउट हुए वही साल 2004 से 2018 के बीच इंग्लैंड के गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड रिकॉर्ड 25 बार डक आउट हुए.

विश्व के महानतम बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन को भी इंग्लैंड के खिलाफ अपने करियर के आखिरी मैच में ‘डक आउट’ होना पड़ा और उनका औसत 99.94 रह गया.भारतीय खिलाडियों की बात करे तो अजीत आगरकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लगातार 5 पारियों में शून्य पर आउट होकर ‘बॉम्बे डक’ के नाम से जाने गये.

 

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