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वह लड़की, जिसे 4 साल की उम्र में हुआ था पोलियो, बड़ी होकर दुनिया की सबसे तेज धाविका बनी

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इंसान का हौसला बुलंद हो और कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो कोई बाधा उसका रास्ता नहीं रोक सकती. दुनिया में ऐसे कई लोग हुए हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने बुलंद हौसलों के दम पर सफलता हासिल की है. आज हम आपको एक ऐसी लड़की की कहानी सुनाने जा रहे हैं जो बचपन में पोलिओग्रस्त हो गई थी लेकिन सिर्फ और सिर्फ अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर उसने ओलिंपिक में तीन तीन गोल्ड मैडल जीते.

ये कहानी है विल्मा रुडोल्फ की जो 23 जून 1940 को अमेरिका के टेनेसी प्रान्त में एक गरीब अश्वेत परिवार में जन्मी थीं. उनकी माँ घरों में नौकरानी का काम करती थीं और पिता कुली थे. विल्मा का जन्म समय से पहले हो गया था और शायद इसीलिए वह जन्म से बीमार रहती थीं. उसके एक पैर में अक्सर दर्द रहता.
Wilma Rudolph
चार साल की उम्र में पता चला कि विल्मा को पोलियो है और वह चलने फिरने में असमर्थ महसूस करने लगीं. उनकी माँ बहुत हिम्मतवाली और सकारात्मक सोच वाली महिला थीं. वे हमेशा विल्मा का हौसला बढ़ाया करती. रंगभेद के कारण उस समय अश्वेतों को आज की तरह सुविधाएं नहीं मिलती थीं. इसीलिए हर सप्ताह उनकी माँ को उन्हें घर से 50 मील दूर ऐसे अस्पताल में ले जाना पड़ता था जहां अश्वेतों का इलाज किया जाता था.
करीब 5 साल के इलाज के बाद विल्मा की हालत में कुछ कुछ सुधार नजर आने लगा. विल्मा ने धीरे धीरे केलिपर्स के सहारे चलना सीख लिया. हालांकि डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया कि विल्मा बिना सहारे के कभी नहीं चल पाएगी.
पर कहते हैं न, कि हौसला रखने वालों की कभी हार नहीं होती. विल्मा की माँ ने डॉक्टरों की बात सुनी पर वे अपनी बेटी को उसके हाल पर नहीं छोड़ना चाहती थीं. उन्होंने एक स्कूल में विल्मा का दाखिला करा दिया.
एक बार स्कूल में एक खेल प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. उसे देखकर विल्मा ने अपनी माँ से पूछा, ‘क्या मैं भी कभी इसी तरह खेल पाऊँगी ?’
विल्मा की माँ ने कहा, ‘अगर तुम में सच्ची लगन, हौसला और कुछ पाने की चाहत है तो कोई भी काम असंभव नहीं है.’
अब विल्मा को खेलने का जूनून सवार हुआ लेकिन केलिपर्स के कारण वह ठीक से चल नहीं पाती थी. अतः एक दिन जिद करके उसने अपने केलिपर्स उतार दिये और बिना सहारे के चलना सीखने लगी. इस कोशिश में वह कई बार चोटग्रस्त भी हुईं पर अपने जूनून के आगे उसने दर्द को बर्दाश्त करना सीख लिया.
धीरे धीरे 2 साल गुजर गए और 11 की होते होते विल्मा बिना सहारे के चलना सीख गई. विल्मा की माँ ने जब यह बात उसके डॉक्टर को बताई तो वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और उससे मिलने उसके घर आये. उन्होंने न सिर्फ विल्मा को शाबाशी दी बल्कि उसका हौसला बढ़ाया.
डॉक्टर की शाबाशी ने विल्मा के लिए एक तरह से ऊर्जास्रोत का काम किया. चलने वह लगी ही थी, अब उसने तय किया कि वह दौड़ना सीखेगी और धाविका बनेगी. पोलियो प्रभावित पैर के लिए उसने एक ऊंची एड़ी का जूता बनवाया और उसे पहनकर खेलना शुरू कर दिया.
विल्मा की माँ ने बेटी की इच्छा देखते हुए पैसे की तंगी के बावजूद उसके लिए एक कोच का इंतजाम किया. स्कूल वालों ने भी एक पोलिओग्रस्त बच्ची को खेलने के लिए प्रोत्साहन दिया.
1953 में जब विल्मा 13 साल की थीं तब उन्होंने एक अंतरविद्यालयीन प्रतियोगिता में भाग लिया और उसमें वह आखिरी स्थान पर रहीं. लेकिन वह इस बात से निराश नहीं हुई. बल्कि अपनी खामियों को खोजकर उन्हें दूर करने के प्रयास में लग गईं.
विल्मा ने 8 बार असफलता का कडवा घूँट पिया और आखिर 9वीं बार में उसने पहली बार सफलता का स्वाद चखा. इस जीत ने उसका हौसला आसमान पर पंहुचा दिया.
15 की उम्र में विल्मा ने आगे की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया. वहाँ एड टेम्पल नामक एक कोच से मुलाक़ात हुई. जब विल्मा ने उन्हें धाविका बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया तो वे बहुत खुश हुए और पूरी मदद का आश्वासन दिया.
इसके बाद तो विल्मा ने रात दिन एक कर दिया और लगातार अपने प्रदर्शन को सुधारती गई. और आखिरकार वह अवसर भी आया जब उसे अपने देश की ओर से ओलिंपिक में खेलने का मौका मिला. 1956 में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित इस प्रतियोगिता में विल्मा रुडोल्फ ने कांस्य पदक जीता. उसने लौटकर यह कांस्य पदक अपने सहपाठियों को दिखाया और कहा कि 1960 के ओलिंपिक में वह गोल्ड जीतकर लाएगी. तब विल्मा सिर्फ 16 साल की थीं.
1960 के ओलिंपिक रोम में आयोजित हुए और वहाँ विल्मा का सामना जुट्टा हेन नामक एक ऐसी धाविका से हुआ जिसे अब तक कोई हरा नहीं सका था. पहली रेस 100 मीटर की थी जिसमें विल्मा ने जुट्टा को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया. दूसरी रेस 200 मीटर की हुई जिसमें विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुट्टा से ही हुआ और विल्मा ने इसमें भी उसे हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया.

अब बारी थी 400 मीटर रिले रेस की जिसमें सबसे तेज दौड़ने वाला धावक सबसे आखिर में दौड़ता है. संयोग देखिये कि इसमें भी विल्मा का मुकाबला जुट्टा से ही था. विल्मा की टीम की पहली तीन धाविकाओं ने अपनी बेटन आसानी से बदल ली लेकिन जब विल्मा की बारी आई तो हड़बड़ी में वह उनके हाथ से छूट गई.
इस दौरान जुट्टा उनसे काफी आगे निकल गईं. विल्मा ने जब यह देखा तो उसने अपनी बेटन उठाई और किसी मशीन की तरह इतनी तेज दौडीं कि 400 मीटर की रेस भी अपने नाम कर ली.
इतिहास रच गया था. विल्मा लगातार 3 गोल्ड मैडल जीतने वालीं अमेरिका की प्रथम अश्वेत खिलाड़ी बन गईं थी. अखबारों ने उसे ‘Fastest woman on Earth’ के विशेषण से नवाजा. अमेरिका के अश्वेत खिलाड़ियों के लिए वे आदर्श बन चुकी थीं.
एक ऐसी लड़की, जिसके बारे में डॉक्टरों ने कहा था कि बिना सहारे के नहीं चल पाएगी, उसने दौड़ में दुनिया में सबसे तेज होने का खिताब हासिल कर लिया था. विल्मा की उपलब्धियों पर गर्वित अमेरिका ने उनके ऊपर डाकटिकट जारी किया. उनके जीवन पर कई डाक्यूमेंट्री फ़िल्में बनीं, कई पुस्तकें लिखी गईं.
अंत में, कहानी का सार वही है कि “कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…”.

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