चालाक साहूकार और बुद्धिमान लड़की

चालाक साहूकार और बुद्धिमान लड़की

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बहुत पुरानी बात है. एक गाँव में एक गरीब किसान रहता था जिसके एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी. दुर्भाग्य से वह भोला-भाला किसान अपने ही गाँव के एक बेहद चालाक और मक्कार साहूकार के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था और लाख जतन करके भी कर्ज से मुक्त नहीं हो पा रहा था.

दरअसल अधेड़ हो हुके साहूकार की नज़र किसान की बेटी पर थी, और वह किसी भी तरह उसे हासिल करना चाहता था. किसान यह बात समझता था पर अपनी फूल जैसे बेटी को उस बुढापे में कदम रख चुके बदसूरत आदमी को नहीं सौंपना चाहता था.

एक दिन साहूकार ने  सभी गाँव वालों के बीच में किसान के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनी बेटी की शादी उससे कर दे तो वह उसका पूरा कर्जा माफ़ कर देगा.

किसान और उसकी बेटी, दोनों ही इस प्रस्ताव से घबरा गए और कोई जवाब न दे सके.

चालाक साहूकार उनकी दुविधा को भांप गया और आवाज में नरमी लाते हुए बोला – “चलो फैसला तुम्हारे भाग्य पर छोड़ देते हैं ! मैं एक थैले में एक काला और एक सफ़ेद कंकड़ डालता हूँ … तुम अपनी बेटी से कहो कि वह बिना देखे उसमें से एक कंकड़ निकाले. यदि उसने काला कंकड़ निकाला तो उसे मुझसे शादी करनी होगी और मैं तुम्हारा कर्जा माफ़ कर दूंगा… और यदि सफ़ेद कंकड़ निकाला तो उसे मुझसे शादी नहीं करनी पड़ेगी और तब भी तुम्हारा कर्जा माफ़ हो जाएगा ! बोलो है मंजूर ?”

सभी गांव वालों ने  इस प्रस्ताव का समर्थन किया. मरता क्या न करता ? उन दोनों ने भी हामी भर दी.

साहूकार ने वहीं पास में ही पड़े रेत के ढेर में  से 2 कंकड़ उठाये और थैले में डाल लिए. लड़की, जो कि यह सब गौर से देख रही थी, उसने ध्यान दिया कि साहूकार ने दोनों काले कंकड़ ही उठाकर थैले में डाले हैं. परन्तु डर के मारे कुछ बोल न सकी.

साहूकार थैले को लड़की के सामने लाकर बोला – “आँख बंद करो और इस थैले में हाथ डालकर एक कंकड़ निकाल लो …”

लड़की ने आँखें बंद की, थैले में हाथ डाल कर एक कंकड़ उठाया और संतुलन खोने का नाटक  करते हुए जमीन पर गिर पड़ी. गिरने के दौरान उसने कंकड़ को हाथ से कुछ इस तरह छिटकाया कि वह वापस रेत के ढेर में जा मिला.

लड़की तुरंत ही खडी होकर बोली – “माफ़ करना, अचानक चक्कर आ गया था …?”

साहूकार चीखा – “पर वो कौन से रंग का कंकड़ था अब ये कैसे पता चलेगा ?”

लड़की – “बड़ी आसानी से ! … आपके थैले से मैंने एक ही कंकड़ निकाला था, दूसरा अभी भी उसके अन्दर है. अगर उसमें काला बचा हुआ है तो इसका मतलब मैंने सफ़ेद निकाला था, और अगर सफ़ेद बचा हुआ है तो इसका मतलब मैंने काला निकाला था !”

सभी गांववाले भी लड़की की इस बात का समर्थन करने लगे.

अब थैले में से तो काला कंकड़ निकलना ही था, क्योंकि साहूकार ने थैले में दोनों कंकड़ काले ही डाले थे. सबकुछ गांववालों के सामने हो रहा था इसलिए अब साहूकार अपनी बातों से पलट भी नहीं सकता था.

मजबूरन उसे किसान का कर्जा माफ़ करना पड़ा और लड़की से शादी का विचार भी त्यागना पड़ा.  किसान और उसकी बुद्धिमान बेटी ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर को चले गए.

 

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