कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की ये ग़ज़ल, ग़ज़ल नहीं, ज़िन्दगी की हकीकत है

कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की ये ग़ज़ल, ग़ज़ल नहीं, ज़िन्दगी की हकीकत है

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भारतीय उर्दू शायरों के बीच अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले कृष्ण बिहारी ‘नूर’ का नाम शायरी से मोहब्बत रखने वाले लोगों के लिए कोई अपरिचित नहीं है. जब वो थे, तब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ऐसा कोई बड़ा मुशायरा नहीं होता था जिसमें उन्हें न बुलाया जाता हो.
‘नूर’ साहब ने अपने जीवन काल में अनेक रचनाएं लिखीं और भारतीय साहित्य जगत में एक ख़ास मुकाम हासिल किया. आज हम उनकी तमाम रचनाओं में से एक ग़ज़ल छांटकर आपके लिए लाये हैं, जो हमें तो बहुत पसंद है ही, आपको भी यकीनन पसंद आएगी. ये ग़ज़ल इंसान की ज़िन्दगी की हकीकत को एक तरह से खोलकर सामने रखती है. आप इन शेरों को खुद पढ़कर देखिये ….

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।
 
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं|

ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।

सच घटे या बड़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।

ज़िन्दगी! अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं।

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं।

कैसे अवतार कैसे पैग़म्बर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं।

उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्या
ख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं।

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं।


(Krishna Bihari Noor Ghazal / Shayari : Zindagi se badi koi saza hi nahi)

 

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